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Sunday, 29 September 2024 | 04:46 am

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नृसिंह अवतार का मुख्य उद्देश्य अधर्म के प्रतीक दैत्य हिरण्यकश्यप का वध करना तथा अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करके उसे राज सिंहासन पर

भगवान विष्णु का नृसिंह अवतार: अपने भक्त प्रह्लाद को बचाने एवं आततायी का नाश करने हेतु भगवान विष्णु ने लिया चौथा अवतार

भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह भगवान का शरीर मनुष्य का था जबकि उनका मुख सिंह यानी कि शेर का था इसी कारण उन्हें नर + सिंह = नरसिंह कहा जाता है। नरसिंह अवतार भगवान विष्णु के उग्र रूप का आभास कराता है । नरसिंह भगवान के शरीर में हाथ के स्थान पे शेर के पंजे थे और उसमे बड़े बड़े नाखून इसी नाखून से भगवान ने हिरण्यकश्यपु का वध किया था।
 |  Satyaagrah  |  Dharm / Sanskriti

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एक दिन गुरु शुक्राचार्य प्रहलाद की शिकायत लेकर हिरणाकश्यप के पास पहुचे और कहामहाराज , आपका पुत्र हम जो पढ़ाते है वो नही पढ़ता है और सारा समय विष्णु के नाम ने लगा रहता हैहिरणाकश्यप ने उसी समय गुस्से में प्रहलाद को बुलाया और पूछा कि वो दिन भर विष्णु का नाम क्यों लेता रहता है। प्रहलाद ने जवाब दियापिताश्री , भगवान विष्णु ही सारे जगत के पालनहार है इसलिए मै उनकी पूजा करता हु मै दुसरो की तरफ आपके आदेशो को मानकर आपकी पूजा नही कर सकता हुआ “|

हिरणाकश्यप ने अब शाही पुरोहितो से उसका ध्यान रखने को कहा और विष्णु का जाप बंद कराने को कहा लेकिन कोई फर्क नही पड़ा। इसके विपरीत गुरुकुल में प्रहलाद दुसरे शिष्यों को भी उसकी तरह भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए प्रेरित करने लगा।

हिरणाकश्यप ने परेशान होकर फिर प्रहलाद को बुलाया और पूछापुत्र तुम्हे सबसे प्रिय क्या है ?”

प्रहलाद ने जवाब दियामुझे भगवान विष्णु का नाम लेना सबसे प्रिय लगता है

अब हिरणाकश्यप ने पूछाइस सृष्टि में सबसे शक्तिमान कौन है ?”

प्रहलाद ने फिर उत्तर दियातीन लोको के स्वामी और जगत के पालनहार भगवान विष्णु सबसे सर्वशक्तिमान है

अब हिरणाकश्यप को अपने गुस्से पर काबू नही रहा और उसने अपने पहरेदारो से प्रहलाद को विष देने को कहा। प्रहलाद ने विष का प्याला पूरा पी लिया लेकिन उसकी मृत्यु नही हुयी। सभी व्यक्ति इस चमत्कार को देखकर अचम्भित रह गये।

अब हिरणाकश्यप ने आदेश दिया कि प्रहलाद को बड़ी चट्टान से बांधकर समुद्र में फेंक दो लेकिन फिर चमत्कार हुआ और रस्सिया अपने आप खुल गयी। भगवान विष्णु का नाम लेकर वो समुद्र जल से बाहर गया। इसके बाद एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न था तब उस पर उन्मत्त हाथियों के झुण्ड को छोड़ दिया लेकिन वो हाथी उसके पास शांति से बैठ गये।

अब हिरणाकश्यप ने अपनी बहन होलिका और बुलाया और कहाबहन तुम्हे भगवान से वरदान मिला है कि तुम्हे अग्नि से कोई नुकसान नही होगा , मै तुम्हारे इस वरदान परखना चाहता हूं , मेरा पुत्र प्रहलाद दिन भर विष्णु का नाम जपता रहता है और मुझसे सामना करता हैमै उसकी सुरत नही देखना चाहता हु …..मै उसे मारना चाहता हु क्योंकि वो मेरा पुत्र नही है …..मै चाहता हु कि तुम प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि पर बैठ जाओ

होलिका ने अपने भाई की बात स्वीकार कर ली।

अब होलिका ने ध्यान करते हुए प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाया और हिरणाकश्यप को आग लगाने को कहा। हिरणाकश्यप प्रहलाद के भक्ति की शक्ति को नही जानता था। फिर भी आग से प्रतिरक्षित होलिका जलने लग गयी और उसके पापो ने उसका नाश कर दिया। जब आग बुझी तो प्रहलाद उस जली हुयी जगह के मध्य अभी भी ध्यान में बैठा हुआ था जबकि होलिका कही भी नजर नही आयी।

अब हिरणाकश्यप भी घबरा गया और प्रहलाद को ध्यान से खीचते हुए ले गया और चिल्लाते हुए बोलातुम कहते हो तुम्हारा विष्णु हर जगह पर है , बताओ अभी विष्णु कहा पर है ? वो पेड़ के पीछे है या मेरे महल में है या इस स्तंभ में है बताओ ?

प्रहलाद ने अपने पिता की आँखों में आँखे मिलाकर कहाहां पिताश्री , भगवान विष्णु हर जगह पर है

क्रोधित हिरणाकश्यप ने अपने गदा से स्तम्भ पर प्रहार किया और गुस्से से कहातो बताओ वो कहा है

हिरणाकश्यप दंग रह गया और देखा कि वो स्तम्भ चकनाचूर हो गया और उस स्तम्भ से एक क्रूर पशु निकला जिसका मुंह शेर का और शरीर मनुष्य जैसा था | हिरणाकश्यप उस आधे पशु और आधे मानव को देखकर पीछे हट गया। तभी उस आधे पशु और आधे मानव ने जोर से कहामै नारायण का अवतार नरसिंह हु और मै तुम्हारा विनाश करने आया हूं

हिरणाकश्यप उसे देखकर जैसे ही बच कर भागने लगा तभी नरसिंह ने पंजो से उसे जकड़ दिया। हिरणाकश्यप ने अपने आप को छुडाने के बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा।

नरसिंह अब हिरणाकश्यप को घसीटते हुए दरवाजे की चौखट तक ले गया जो ना घर में था और ना घर के बाहर और उसे अपनी गोद में बिठा दिया जो ना आकाश में था और ना ही धरती पर और सांझ के समय ना ही दिन और ना ही रात हिरणाकश्यप को अपने पंजो नाहे अस्त्र ना ही शस्त्र से उसका वध कर दिया।हिरणाकश्यप का वध करने के बाद दहाड़ते हुए नरसिंह सिंहासन पर बैठ गया।

सारे असुर ऐसे क्रूर पशु को देखकर भाग गये और देवताओ की भी नरसिंह के पास जाने की हिम्मत नही हुयी। अब बिना डरे हुए प्रहलाद आगे बढ़ा और नरसिंहा से प्यार से कहाप्रभु , मै जानता हु कि आप मेरी रक्षा के लिए आये हो

नरसिंह ने मुस्कुराकर जवाब दियाहां पुत्र मै तुम्हारे लिए ही आया हु , तुम चिंता मत करो तुम्हे इस कथा का ज्ञान नही है कि तुम्हारे पिता मेरे द्वारपाल विजय है उन्हें एक श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा और तीन ओर जन्मो के पश्चात उसे फिर वैकुण्ठ में स्थान मिल जाएगा इसलिए तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है

प्रहलाद ने अपना सिर हिलाते हुए कहाप्रभु अब मुझे कुछ नही चाहिएनरसिंह ने अपना सिर हिलाया और कहानही पुत्र तुम जनता पर राज करने के लिए बने हो और तुम अपने जनता की सेवा करने के पश्चात वैकुण्ठ आना

प्रहलाद अब असुरो का उदार शासक बन गया जिसने अपने शासनकाल के दौरान प्रसिद्धि पायी और असुरो के पुराने क्रूर तरीके समाप्त कर दिए।

नरसिंह मंत्र

नरसिंह के बारे में कई तरह की प्रार्थनाएँ की जाती हैं जिनमे से यह प्रमुख है।

नरसिंह मंत्र ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

अर्थात : हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्षा आत्मसमर्पण करता हूँ।

भगवान नरसिंह अवतार के स्तुति के अन्य मंत्र :

प्रहलाद हृदयाहलादं भक्ता विधाविदारण। शरदिन्दु रुचि बन्दे पारिन्द् बदनं हरि ॥
नमस्ते नृसिंहाय प्रहलादाहलाद-दायिने। हिरन्यकशिपोर्ब‍क्षः शिलाटंक नखालये ॥
इतो नृसिंहो परतोनृसिंहो, यतो-यतो यामिततो नृसिंह। बर्हिनृसिंहो ह्र्दये नृसिंहो, नृसिंह मादि शरणं प्रपधे ॥
तव करकमलवरे नखम् अद् भुत श्रृग्ङं। दलित हिरण्यकशिपुतनुभृग्ङंम्। केशव धृत नरहरिरुप, जय जगदीश हरे ॥

 
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